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माटी की खुशबू तुलसी काव्य महोत्सव में सलोनी 'क्षितिज' रस्तोगी_saahity


विषय  :    *ग्रामीण परिवेश* 
शीर्षक:     *माटी की खुशबू* 


सोचने की रफ्तार कुछ इतनी तेज हो गई।
अपने मन आत्मा को छोड़ आगे बढ़ते गए।
गाँवो में बसीअपनी यादों को फिर से जी उठती हूँ।
गाँवों में बसे जीवन को फिर जी उठती हूँ।

सवेरे मुँह उठ जाना,गायों की सानी कराना।
दूध निकाल चूल्हे पर चढ़ाना, छाछ बनाना।
कुँए पर जा बाल्टी गिराना,रस्सी से ऊपर लाना।
रुनझुन बैलों की घंटी संग,धीरे धीरे से गुनगुनाना।

दूर घंटे को सुनकर,दौड़ लगा पाठशाला में जाना।
बैठ पेड़ की छाँव तले,मास्टर जी का पाठ पढ़ाना।
नहीं किताबें मोटी पर, जीवन के आदर्श बताना।
सादा जीवन, उच्च विचार का अर्थ बताना।

ग्रामीण परिवेश में पली बढ़ी हूँ, मान बहुत है।
मेहनत मेरी रग रग में है,जान बहुत है।
आधुनिकता की होड़ नही, पर शान बहुत है।
 *माटी की खुशबू* से महकूँ,अरमान बहुत है।।

स्वरचित#मौलिक#विषयाधारित
सलोनी 'क्षितिज' रस्तोगी
जयपुर (राजस्थान)
salonikshitiz@gmail.com
9352106161

तुलसी काव्य प्रतियोगिता में अर्चना जी की कविता विकसित हुऐ गांव_sahity


   विकसित हुऐ गांव

देश पूरा हो गया डिजिटल,गांवो में भी हुई है हलचल,
वहां पर भी डिज़ीटली ही, लेन- देन होता है पल-पल। 

शहरों में पानी तो देखो, बोतल में बिकता है आजकल,
और गांव में शुद्ध जल की,धारा बहती रहती कल-कल।

बारिश आती खेत जोतने,कृषक निकल पड़े लेकर हल, 
रिमझिम बारिश में भीगकर, बच्चे करते खूब कोलाहल।

शुद्ध हवा है मिले जहां पर, प्रकृति मोहे मन को हर-पल, 
ऐसा सुंदर दृश्य जहां पर,बहता है निर्मल जल कल-कल।

इंटरनेट का गांव में भी,दिखता है अब असर भी पल-पल,
ऑनलाइन पर कार्य करते, दिखते हैं कई बच्चे आजकल।

हैं जीवित रखते संस्कारों को, नही  भूलते हैं पिछला कल, 
विकसित हो रहे गांव भी, अब वे सुधार रहे हैं अपना कल।

       डॉ. अर्चना राठौर 
लेखिका एवं समाज सेविका
        झाबुआ, (म.प्र.) 
        पिन- ४५७६६१
चलित दूरभाष-७८६०८५६५

साहित्यकुंज तुलसीदास मुन्शी प्रेमचंद काव्य प्रतियोगिता कविता यादों में गांव_hira singh

कविता   यादों में गांव.     

कच्चे स्लेटदार सुंदर सलोने मकान।
सांझा सुंदर कितना सुखदायी आंगन।।
धमाचौकडी मचाता वो भोला बचपन। 
संग परिवार युवती नारी करती थिरकन।।
चाचू दादा बोल रहा मासूम लड़कपन।
अम्मा बापू कहती थी दिल की धड़कन।। 
मंदिर अधुना बना खो गया वह पुरातन।
पीपल बूढ़ा खो गया मूर्ति का अद्यतन।।
यादों में चौपाल की बैठकों का सुघड़पन। संस्कृति  दर्पण झलकाता हरेक युवातन।
अमृत बेला सुंदर रोटी पकाता नारीजन।
लोक गीत सुनाती प्रफुल्लित होता मन।। 
सुभाषित ध्वनि सुन जाग उठा नगरजन। 
मूर्छित नगर संस्कृति जगाता गीत दर्पण।
भारी घास गठरी उठाता नहीं थकता तन।
शिकन नहीं दुःख बांटता उल्लासित जन। 
कथा सुनाता बुढपन सुनता खुशी से जन
तैयार सहयोगके लिए होता वो लड़कपन
पनघट में सुख-दुख बांटती हर नारीजन।
ईर्ष्या द्वेष रहित सब में समाया भोलापन।
 सहयोग में नहीं अखरता ये अकेलापन। 
 बोझ नहीं देवतारुप मानता अतिथिगण।
महान संस्कृति दर्शन कराता ग्रामीण जन
वृक्ष लगाता रक्षा करता बनाता पर्यावरण

हीरा सिंह कौशल गांव व डा महादेव सुंदरनगर मंडी हिमाचल प्रदेश मोबाइल 9418144751

तुलसी काव्य प्रतियोगिता में मेरा गांव_saroj meti

*गाँव मेरा*

गाँव मेरा है बडा प्यारा,
दुनिया में सबसे न्यारा।

सह्याद्री के उस पार मेरा गाँव
गेहूँ - गन्ने की पडी हैं छाँव,
कावेरी मेरे गाँव की गंगा 
खेती ही किसान का धंधा ।

घर -घर में अनाज का है 
भंडार,
हर दिलों में छिपी है प्रेम सागर,
मदद के हाथ बढाते हैं सब,
गाँ मे सुख -शांति दिय है रब। 

गाँव  मेरा है बडा़ प्यारा ,
दुनिया में सबसे न्यारा।


आओ मित्र यहाँ, तुम्हें स्वागत है,
देखो, भारत समा है मेरे गाँव में
 खेलतें हैं बच्चें ,गली- गली में, 
हर बगीचे में फल- फूल भरे हैं। 


गाँव  मेरा है बडा़ प्यारा 
दुनिया में सबसे न्यारा।

आंगन में हैं तुलसी-हीना बिरवा ,
राम -रहिम मिटातें हैं द्वेष  कडुआ,
मेरे लोग जाति -धर्म से दूर खडे,
भाईचार-सदाचार से सब हैं अडे।

गाँ मेरा  है बडा़ प्यारा,
दुनिया में सबसे न्यारा।

पूष की ठंड कश्मीर की याद ,
मोगरे महक, वाह.. खीर की स्वाद,
तीज मनाते गाँ की ललनाएँ
कसरत में अव्वल हैं युवाएँ।

गाँव मेरा है बडा़ प्यारा 
दुनिया में सबसे न्यारा।

पंच परमेश्वर यहाँ हैं पूजतें,
भगत सुजान हैं धर्म निभातें।बागिया में गाँ मेरा सदा बहार 
हर किसी को देते हैं सत्कार।


गाँव मेरा है बडा़ प्यारा ,
दुनिया में सबसे न्यारा।
 


डाॅ. सरोजा मेटी लोडा़य कर्नाटक ।

तुलसीदास काव्य प्रतियोगिता में अमिता मराठे की बरखा_sahity


             बरखा
आओ बरखा छमाछम बरसो।

गाँव की डगरिया भीगी हो जाये।
कृषक मुख पे मुस्कान चली आये।
सुखे ताल -तलैया पोखर भर जाए।
खेतों की माटी भी तृप्त हो जाये।
आओ बरखा छमाछम बरसो।

नदी नाले कलकल निनाद कर बहे।
खुशी से गाय बछिया के दिल बहले।
धरणी की हरीतिमा झूमने लग जाये।
खग -विहंग डाल-डाल पर नृत्य करें।
आओ बरखा छमाछम बरसो

तरू शाखा पे पात-पात खिल उठे।
रवि ताप से प्राणी  निजात पाये।
गगन में उमड़ घुमड़ बदरा देखें।
नर नारी बुलाए  गुडधानी खाने।
आओ बरखा छमाछम बरसो।

सावन के गीतों में पुलकित हो जाये।
सजनी साजन मिलन की पीर लिए।
दूर देश से आया जलदराज नभ में।
अविरल नेह के आश्रु मोती प्रेम भरे।
आओ बरखा छमाछम बरसो।

अमिता मराठे
स्वरचित
अप्रकाशित
इंदौर, मध्यप्रदेश
7389707831

प्रतियोगिता के व्यूज

तुलसी काव्य प्रतियोगिता में डॉ नूर फ़ात्मा की रचना पढिये_sahity




     मेरे दिली जज़्बात 
     

🔅🔅🔅🔅🔅🔅🔅

तुलसी ख़ुसरो हो या कबीरा,
काली दास सूरदास हो मीरा।

एक हो सबने ये बतलाया,
आदमियत का पाठ पढ़ाया।

न कोई तेरा न कोई मेरा,
जा मिलेगा सब एक ही डेरा।

एक शज़र की सब हैं शाख़ें,
जैसे नदी की बहती धारा।

"नूर" ठाठ पड़ा रह जायेगा
  ख़ाक में सब जा मिलेगा 

      डाॅ. नूर फ़ात्मा
      मुगलसराय-चन्दौली
     24/06/2021

ग्राम परिवेश। काव्य प्रतियोगिता_vinayak pandey

*ग्राम परिवेश*

परिवेश मेरे गाँव का,
जाना है मैं ने इस वर्ष,
जाना है गाँव की भव्यता को,
और झेला है दरिद्रता को भी,

इस बार बन बैठा था बोझ,
अपनी ही कर्म भूमि पर,
जिसे बनाया था मैंने,
अपने ही बाहुबल से,
न ढल सका उसीके परिवेश में,
औ बन गया प्रवासी मैं अपने ही देश में,

पहुंचा नगर को महानगर बना,
बेमूल्य हो अपने गाँव मे,
मगर परिवेश कुछ भिन्न न लगा शहर से,
फर्क़ बस भीड़ का था,
वहाँ गैरों मे अकेले थे,
औ यहां अपनों के बीच तन्हा,

महाभारत अतीत नहीं,
वो आज है और कल भी होगी,
द्रौपदी तो मात्र बहाना थी,
ज़मी तो हस्तिनापुर कि हथियानी थी,
पुश्तैनी ज़मी के खातिर,
जंग वही पुरानी सी,

आज भी नहीं सुरक्षित यहां,
घर कि बेटी हो या पत्नियां,
सोच अभी भी वहीं कहीं हैं,
जाती हो या लड़कियाँ,
अपनी है तो इज्ज़त नहीं तो गालियाँ,

यहाँ नहीं केवल राम घरों मे,
कंस भी साथ मे रहता है,
एक जो पिता को ईश्वर माने,
दूसरा गालियां देता है,
मर्यादा को भूला शहर,
अपने सांकल मे करता गाँव,

दिखा की दुखा हृदय ऐसा,
अपने गाँव को बदलते देख,
दिखा इस बार मुझे धूमिल होता,
मेरे गाँव का खुशमिज़ाज परिवेश।


नाम :- विनायक पांडे;
कक्षा :- TYBA;
महाविद्यालय :- भारतीय विद्या भवन, अंधेरी (पश्चिम), मुंबई,(Bhavans college, Mumbai);
विश्वविद्यालय :- मुंबई विश्वविद्यालय;
Contact no :- 9892267623;
Mail id :- Vinayakpandey462@gmail.com