Followers

अरविंद अकेला की लघुकथा काश_sahitykunj

लघुकथा

       काश
--------------------
      कोरोना काल की इस महामारी के दौरान सरकारी अधिकारी एवं सोशल मीडिया के लोग लोगों को लगातार जागरूक कर रहे थे कि लोग बिना मास्क के घर से बाहर नहीं निकलें,सोशल डिस्टेंसींग का पालन करें, गलत बयानी नहीं करें एवं किसी तरह का अफवाह नहीं फैलायें,लेकिन हमारे शहर के चर्चित विधायक रंग बहादुर सिंह पर इसका कोई असर नहीं पड़ा रहा था। बिधायक जी लगातार अपने क्षेत्र में अनावश्यक बिना मास्क के निकल रहे थे। मिडिया वालों ने उनसे लगातार सम्पर्क कर सवाल पुछा कि सर आप कोरोना महामारी को रोकने के लिए क्या प्रयास कर रहे हैं तब विधायक श्री रंग बहादुर सिंह ने जबाब दिया कि कोरोना वोरोना कहीं नहीं है आप लोग झुठ मूठ के गलत बोल रहे हैं कि कोरोना फैला है,यह सब मामूली सर्दी, खाँसी,बुखार है।
     कुछ दिन बाद बिधायक जी को बुखार के साथ श्वास लेने में तकलीफ हुयी जिस कारण उन्हें अस्पताल मे भर्ती होना पड़ा जहाँ कोरोनो पॉजिटिव होने के कारण उनका निधन हो गया।
    उनके शोक सभा में शामिल पत्रकार प्रियदर्शी ने कहा कि काश..., बिधायक जी सोशल डिस्टेंसींग का पालन किये होते एवं  मुँह पर मास्क लगाकर घर से निकले होते एवं नियमों का पालन किये होते तो आज बिधायक जी हमारे बीच जिन्दा होते।
    प्रियदर्शी की बातें सुनकर वहाँ उपस्थित लोगों ने यह प्रण किया कि बिना मास्क लगाये अनावश्यक घर से बाहर नहीं निकालेंगे एवं जीवन में सदैव सोशल डिस्टेन्ससिग का पालन करेंगे।
     ---------000------
           अरविन्द अकेला

हुश्न ए शोला में शबनम भी खाक हुआ,दरिया ए मुहब्बत में दिल जलकर राख हुआ_sushma singh

गजल
     ------------------
 
हुश्न ए शोला में  शबनम  भी  खाक  हुआ,
दरिया ए मुहब्बत में दिल जलकर राख हुआ।


आंखों से चला तीर दिल के आर-पार हुआ
पलकें झुकाए वो मुस्कुराए हम पर वज्रपात हुआ।


शोख अदाओं ने कातिल सा प्रहार किया,
बिगड़ा ना कुछ उनका मेरा बुरा हाल हुआ।


सौन्दर्य सिंधु वह अथाह वय सोलह पार किया,
निद्रालस की अंगड़ाई दिल पर शत शर वार हुआ।


अपलक निहारते नयन मानो झपकना भूल गए,
तांबई  लरजती काया,नख शिख दीदार हुआ।
                               सुषमा सिंह
                           ------------------------ 
 ( सर्वाधिकार सुरक्षित एवं मौलिक)

सत्य पथ

 



सत्य कर्म के लिए कभी न आलस नाम को,

बहाना बनाकर न बिगाड़ श्रेष्ठ काम को l

जो गीता के उपदेश उसे आत्मसात कर लो,

विजय के हर पथ को कर्म के साथ कर लो


जीवन एक रंगमंच बेहतर एवं सत्य लीला है,

दूसरों को आघात कर कैसे जीवन जीना है l

मानव के आँख में धूल झोंक कर कैसे बच पाओगे,

लेकिन परम ब्रम्ह के न्याय से क्या बचा ले जाओगे l


धोखा दे कर कुछ क्षण ही खुश रह पाओगे,

शेष क्षण जीवन को अफसोस मे बिताएंगे l

मन के सकारात्मक शक्ति का आह्वान करो,

नकारात्मक चरित्र के विश्वास का त्राण करो l


बिना व्यथाओं के मनुज मे रंग प्रिय भाता नहीं,

ठोकरे खाए बिना पथ ठोस जग पाता नहीं l

गीता उपदेश के हर श्लोक हैं बहुमूल्य,

चिन्ता करना चिता के है समतुल्य l

चिंता क्या करना सत्य पथ पर बढ़ते चलो,

जीवन के लक्ष्यों को कर्म से समन करते चलो l

-----------------------------------

स्वरचित एवं मौलिक

खेमराज साहू "राजन" दुर्ग, छत्तीसगढ़

डॉ अलका पाण्डेय , राष्ट्रीय अध्यक्ष ,अग्निशिखा मंच,मुम्बई की लघुकथा, खटिया तोड़ना_sahitykunj

 खटीयां तोड़ना 

-:लघुकथा :-
प्रेषक-डॉ अलका पाण्डेय , राष्ट्रीय अध्यक्ष ,अग्निशिखा मंच,मुम्बई

माधवी बहुत आलसी थी सारा दिन खटीयां तोड़ा करती , पर बहू का आराम आँखों में काँटा बन कर चुभता था । 
ज़रा देर बहू को न देखें तो ..
बहू ओ बहू अरे ओ नाश पीटी कहाँ मर गई , खटीयां तोड़ रही होगी , भगवान बचाये आज कल की बहूओ से 
ज़रा काम किया नहीं की खटीयां तोड़ती नज़र आती है 
शीला माँ की आवाज़ सुन समझ गई कुछ भी कर लो पर माँ जी को मैं ख़ुश नहीं रख सकती एक महिने की बच्ची है मेरी गोद में क्या मैं उसे दूध न पिलाऊँ ...सुलाऊँ नहीं माँ को दया नाम की चीज नहीं है कुछ करना पड़ेगा मुझे , नहले पर दहला देना होगा और वह कमरे से बहार आ कर बोली का हुआ माँ जी क्या बात हो गई जो आप मुझे कोस रही थी , क्या बेटी को दूध न पिलाऊँ भूखी मरने के लिये छोड़ दूँ ...
लड़का होता तो भी आप इसी तरह कोसती बोलो ...आप लड़की न हो ..जो मेरी बेटी जींस दिन से आई हैं आप कोसती रहती हो ...
और शीला ने बेटी को वहीं ज़मीन पर लिटा दिया और माँ जी से बोली अब आज के बाद मैं इसे हाथ नहीं लगाऊँगी ..आप को
ही देखना है दूध पिलाओ नहलाओ सब पर मैं नहीं गोद में लूगी आप हमेशा खटीयां तोड़ने का ताना देती रहती है मैं कामचोर नहीं हूं पर मैं इंसान हूँ थक जाती हूँ । 
और शीला आँखों में आये आँसू पोंछती हुई काम में लग  गई ..
कुछ देर में बिटीया रोने लगी अब माँ जी परेशान बहू ले ले इसे चुप करा लो मेरे वंश का नहीं है । पर शीला ने अंनसुनी कर दी माँ जी आज अपने शब्दो पर बहुत अफ़सोस कर रही थी नाहक में शीला को चिल्लाती हूँ ..जब की खाट तो मैं तोडती हूँ वह तो सारा दिन काम करती है । 
बिटीया रोयें जा रही थी , 
पडोसी आ गई और बोली बच्ची क्यों रो रही है माँ नहीं है क्या, इसकी ...? माँ जी क्या बोलती जब बच्ची का बुरा हाल होगया रो रो कर तब माँ जी शीला के पास गई और बोली बहू सबके सामने माफी माँगती हूँ आज के बाद बेटा -बेटी में फ़र्क़ न करुगी उठा ले गोद में मेरी लाडो को वर्ना मर जायेगी माफ़ कर दे मुझे । 
शीला बोली माँ जी माँफी मत माँगो , हम औरतें ही अपनी बेटियों को प्यार नहीं देगी तो समाज कैसे देगा । 
पड़ोसी महिलाओं ने शीला की बात का समर्थन किया और कहाँ आज से हम सभी बहू , बेटी को प्यार से रखेंगे वहीं तो हमारी वंशबेल बढ़ाती है , 
माँ जी पंलग पर लेट गई और बोली अब लिटा दें मेरी लाडो को मेरे पास आज से हम दोनों खटीयां तोड़ा करेंगे और बहू तुम आराम से काम करना । 
शीला ने मुस्करा कर बिटीया को माँ जी की गोद में दे दिया 
माँ जी लाडो को सीने से लगा लिया । 


@डॉ अलका पाण्डेय , राष्ट्रीय अध्यक्ष ,अग्निशिखा मंच,मुम्बई

डा अंजुल कंसल"कनुप्रिया" की लघुकथा खटिया तोड़ना_sahityakunj

लघुकथा:-
- खटिया तोड़ना

सुशीला देवी बड़ी कर्मठ और साहसी महिला थीं। उनके चार बच्चे थे ,और छोटा वाला बेटा सवा साल का था, तब वह ग्राम सेविका की नौकरी के लिए घर से निकलीँ। काफी पुरानी बात है उस समय महिलाएं नौकरी के लिए नहीं निकलती थीं। सुशीला देवी ने अथक परिश्रम से अपना जीवन निकाला। ससुराल वाले, मायके वालों ने आर्थिक रूप से उनका सहयोग नहीं दिया।उन्होंने मजबूरन नौकरी की, क्योंकि उनके पति सदा खटिया तोड़ते थे और कुछ काम धाम नहीं करते थे।
" काम के ना काज के सौ मन अनाज के" 
सुशीला देवी ने अपने दोनों लड़कों को इंजीनियर बनाया ।आज वह ऊँचे ओहदे पर कार्यरत हैं। अपनी दो बेटियोँ की उन्होंने शादी कर दी।सुशीला देवी की हिम्मत हौसले और निर्डरता को नमन करते हैं।

डा अंजुल कंसल"कनुप्रिया"
4-5-21

तुझी को माने खुदा, तुझी को माने देवता, कोई भजे राम नाम, कोई दरगाह में खड़ा_sahityakunj

हद
   ------------
    ना    हद    अंधेरे   की ,
    ना  ‌ हद    उजाले   की,
    मन  में  विश्वास  हो तो,
    फरक ना इन बातों की।

    तुझी   को  माने   खुदा,
    तुझी  को  माने   देवता,
    कोई    भजे  राम  नाम,
    कोई  दरगाह  में   खड़ा।

    अम्बर   से   खुदा   की,
    बरकत     जो      बरसे,
    अंधेरी  काली  रात  भी,
    चांदी   सी   चमक  उठे।

    धर्मांधता  से बंद  आंखें,
    इबादत     से    खुलेगी,
    हो       देवकृपा ‌     तो,
    जिन्दगी  महक   उठेगी।

    कायनात     का   हरेक,
    राज     वो      जानता,
    कबीर रहीम भी खुद को,
    रामानुरागी    मानता ।

    सब्र      सुकून     बिन ,
    खुशगवार ना होगी  जिन्दगी,
    खुदा    की   है    नेमत,
    करो     उसकी   बंदगी ।

                         सुषमा सिंह
                      ----------------------
    (सर्व सुरक्षित एवं मौलिक)

हमारा स्वास्थ्य



सुबह
की वक्त और ठंडी-ठंडी हवा,

सेहत के लिए लाख रुपये की दवा

अच्छी सेहत ही जीवन की अनमोल धन है,

स्वस्थ्य शरीर में ही स्वस्थ्य मन है

सुबह सुबह करे नियमित सैर,

नही तो जीवन और शरीर का हो जायें  बैर।

धनात्मक सोचे और अच्छा कार्य करे,

स्वयं और दूसरों की जीवन को खुशियो से भरें

उत्तम सेहत के लिए ध्यान रखना जरूरी है,

नही तो जीबन हो जाये केवल मजबुरी है

जो लोग करते है रोज साफ सफाई,

उन्हे कभी नही लेनी पड़ती है दुआ  दवाई।

सबसे पहले हमे रखना होगा शरीर का ध्यान,

फिर करे औरों के लिए और दुसरा काम

अच्छे स्वस्थ्य बिन सब कूछ है अधूरा,

ऊची सोच और ऊची सपना तभी होगा पुरा

घर से बनी खाना खाए लें फास्टफूड,

स्वस्थ जीवन के लिए शरीर कहे वेरी गुड

फास्टफूड नही सभी ताजे फल- सब्जी खूब खाए,

विभिन्न संक्रामक बिमारी से शरीर को बचाए

खाते वक्त बोले कम अच्छी तरह से चबाये,

घुल जाये मुँह की लार खाना अच्छी तरह पचाये

शरीर चमक जाये शुद्ध ताजे पानी से,

स्फूर्ति और ताजगी की नयी कहानी से

जीवन का स्वास्थ्य मंत्र कैसा लगा बताईये,

सेहत के लिए अच्छा लगा हो अपनाईये ।।🥒

🍓🍇🍅🥝🥥🍍🥭🍑🍒🍎🫐🫒

स्वरचित एवं मौलिक

खेमराज साहू "राजन "

दुर्ग,छत्तीसगढ़

एक सुहाना सफर

 222  212 212

काफिया-ना रदीफ़-सफर


*** एक सुहाना सफर ***

*********************

जीवन प्यारा  सुहाना सफर,

दीवाना सा  मस्ताना  सफर।


कटती  ही ना  अकेले कभी,

साथी बिन हो विराना सफर।


चलने  से  राह  आसान  हो,

थम जाए ना  मुहाना  सफर।


मिलती  रहती  सदा  ठोकरें,

धूमिल  होता  जुहाना सफर।


यारों  से गर  डगर  हो भरी

बन जाता है ठिकाना सफर।


पथ पर  कोई  नहीं  कष्ट हो,

नजरों का हो निशाना सफर।


मनसीरत  गर  अकेला  रहे,

बन जाती   राह थाना सफर।

**********************

सुखविंद्र सिंह मनसीरत

खेड़ी राओ वाली (कैथल)