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शिक्षक सह साहित्यकार प्रेम शंकर प्रेमी की प्रेरक रचनाओं को देखिये और अपनी बहुमूल्य प्रतिक्रिया दीजिये_premi

(कविता)

भगवान उसी का सुनता है
*****   *****  *****

ऊपरवाले की लाठी में
होती है कभी आवाज नहीं ।
अंजाम भयानक होता है 
दिखता जिसका आगाज नहीं ।।

जो जैसा करता कर्म यहाँ
धरती पर ही फल पाता है ।
कहते हैं स्वर्ग नरक जिसको
सब यहीं से होकर जाता  है ।।

जिसको हम कहते हैं अपना
वह माया रचित विधाता का ।
जो प्रेम विरह का सूचक है
वह काया रचित विधाता का ।।

जिस परिवार के खातिर खुद
हम पाप कर्म भी कर जाते ।
जब बारी भोगन की आती
सब साथ छोड़ मुकर जाते ।।

हम चकाचौंध के चक्कर में
दिन रात लगाए बैठे हैं ।
अब झूठ फरेब के बीहड़ों मे
अपने को भुलाए बैठे हैं ।।

लाख आभूषण तन पर हो
उसका जीवन में रोल नहीं ।
जब हृदय मैल से भरा पड़ा
तन सुन्दरता का मोल नहीं ।।

जीता है जो औरों के लिए
भगवान उसी का सुनता है ।
काटेगा वैसे फसलों  को
जो जैसे बीज को बुनता है ।।

जिस दौलत को अपना कहता
न साथ में लेकर जाएगा ।
तन भी तेरा एक दिन मानव
धरती पर पड़ा  रह जाएगा ।।
-----------------
💐कविता💐

    💐धुन के पक्के💐

धुन के पक्के जो होते
करते वो कभी विश्राम नहीं ।
रत रहते नित कर्मो में
मिलती है उन्हें आराम नहीं ।।

अपने कर्मो से अक्सर 
इतिहास बनाया करते हैं ।
अथक परिश्रम से पत्थर पर
पौध उगाया करते हैं ।।

पहुंच थी मुश्किल जहाँ हमारी
वहाँ पर झंडा गाड़ दिया ।
बिगड़े हुए हालात का तंबू
जाकर तुरत उखाड़ दिया ।।

किस्मत को भी करे पराजित
धुन के पक्के वे इन्सान ।
उनके कारण आज है रौशन
डगर पड़़े थे जो सुनसान ।।

किया जो देश के खातिर वंदे
उसका उन्हें गुमान नहीं ।
जग गाता है उनकी महिमा
करते खुद गुणगान नहीं ।।

दूर का कौड़ी जो चंदा था
कदम से उसको नाप रहे ।
धरती ,अम्बर और सागर 
सब इनके धुन को भाँप रहे ।।

जोस गजब का इनके अन्दर
उद्यम के सब मतवाले ।
देश के खातिर मर मिटते वे
मानवता के रखवाले ।।
---------------
💐कविता💐

         💐नये युग की मार💐

बदल गए हैं तरीके सारे
बदल गए परिवेश ।
बोलचाल का ढंग बदला
बदल गए हैं भेष ।।

बात पुरानी  न दिखती
बदल गया है दौर।
रिश्तों की मर्यादा का 
करे न कोई गौर ।।

नई बहुरिया आए घर में
अपना रोब जमाए ।
ससुर भँसुर के आगे अपना
पल्लू चले गिराए ।।

बीत गए वो दिन जो घुँघट
घुटने छुआ करती थी ।
तब की बहुएँ मर्यादा  की
मूरत हुआ करती थी ।।

करते थे स्पर्श चरण को
पाते थे आशिष ।
अब दूर से करे सलाम पर
नहीं झुकाते शिष।।

कद्र नहीं माता पिता का
जनम देकर जो पाला हैं ।
खुद को भूखा रख बेटे के
मुह में दिया निवाला है।।

लाभ देख  सत्कार करे
जब आए अतिथि द्वार।
पाने की उम्मीद न जिनसे
दुखता बहुत कपार ।।

होती है सत्संग जहाँ पर
वहाँ न जाते  लोग ।
अश्लील गाने नाच जो हो
तो भीड़ लगाते लोग ।।

कलम किताब हो साथ तभी
जब हाथ में रहे मोबाइल ।
विडियों काँल पर फेस बना
होता हरदम  स्माईल ।।

लूचे और लफंगों की 
बढती जाती तादाद ।
ईज्जतदार घरानो पर 
भी आती जिसकी आँच ।।

प्रेमशंकर सब देखता
बदल रहा संसार।
झेल रहा हरपल यहाँ
नये युग की मार ।
--------------
💐कविता💐

         💐नये युग की मार💐

बदल गए हैं तरीके सारे
बदल गए परिवेश ।
बोलचाल का ढंग बदला
बदल गए हैं भेष ।।

बात पुरानी  न दिखती
बदल गया है दौर।
रिश्तों की मर्यादा का 
करे न कोई गौर ।।

नई बहुरिया आए घर में
अपना रोब जमाए ।
ससुर भँसुर के आगे अपना
पल्लू चले गिराए ।।

बीत गए वो दिन जो घुँघट
घुटने छुआ करती थी ।
तब की बहुएँ मर्यादा  की
मूरत हुआ करती थी ।।

करते थे स्पर्श चरण को
पाते थे आशिष ।
अब दूर से करे सलाम पर
नहीं झुकाते शिष।।

कद्र नहीं माता पिता का
जनम देकर जो पाला हैं ।
खुद को भूखा रख बेटे के
मुह में दिया निवाला है।।

लाभ देख  सत्कार करे
जब आए अतिथि द्वार।
पाने की उम्मीद न जिनसे
दुखता बहुत कपार ।।

होती है सत्संग जहाँ पर
वहाँ न जाते  लोग ।
अश्लील गाने नाच जो हो
तो भीड़ लगाते लोग ।।

कलम किताब हो साथ तभी
जब हाथ में रहे मोबाइल ।
विडियों काँल पर फेस बना
होता हरदम  स्माईल ।।

लूचे और लफंगों की 
बढती जाती तादाद ।
ईज्जतदार घरानो पर 
भी आती जिसकी आँच ।।

प्रेमशंकर सब देखता
बदल रहा संसार।
झेल रहा हरपल यहाँ
नये यूग की मार ।।

कवि --प्रेमशंकर प्रेमी (रियासत पवई )

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