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क्यों रोती हो अपने घर में यह सारा जग तुम्हारा है ।तुम से ही निर्मित जड़ चेतनफैला जग में उजियारा है_sahitykunj

नारी

नारी तेरी अजब कहानी 
ऐसी दुनिया पाई क्यूँ ।
 सहनशीलता की मूर्ति बन
 दर-दर ठोकर खाई क्यूँ ।।

अब युग नहीं है सीता का
जो अगन परीक्षा पास करें ।
 त्याग भवन को जो पल में 
जंगल में जाकर वास करें ।।

गर कदम बढ़ेगा एक तेरा 
दस कदम पीछे बढ़ जाएंगे ।
नारी सुन लो अस्तित्व तेरे 
पद चिन्ह सहित मिट जाएंगे ।।

 कष्टों को सहती सीता भी 
थक कर धरती की गोद गई ।
पांडव पत्नी भी भरी सभा में 
चीरहरण के योग्य भयी ।।

 क्यों रोती हो अपने घर में 
यह सारा जग तुम्हारा है ।
तुम से ही निर्मित जड़ चेतन
फैला जग में उजियारा है ।।

क्यों बनी हो मूरत ममता की 
है वक्त कठोर चट्टान बनो ।
अबला की लाज बचाने को 
ऐ नार जीवित कृपाण बनो ।।

अपने अस्मत की रक्षा ही
पहला कर्तव्य तुम्हारा है ।
उसके मद का तू मर्दन कर
जिसने तुम को ललकारा है ।।

 अब गर्जन कर बरसो नारी
 फन को जो फैलाए बैठे हैं ।
जो अपनी क्रूर निगाहों को 
तुम पर ही टिकाए बैठे हैं ।।

विश्वास करो उन लोगों पर 
जो इसके काबिल जान पड़े ।
क्या मोल है उन तलवारों का 
जो वक्त पे अपने म्यान पड़े ।।

जो नहीं सुनोगी बात मेरी 
हर घर में रावण पाओगी ।
दंतों के बीच में अबला तुम
बस जीभ बनी रह जाओगी ।। 

(मैने अपनी इस कविता के माध्यम से नारी शक्ति को जागृत करने का प्रयास किया है ।)
  
कवि ----प्रेमशंकर प्रेमी ( रियासत पवई )

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