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माता पिता को दुख देकर क्या सुख से रह पाएगा एवम आज है हलचल दिलों मेंमन हमारा शाँत है_premi

 संपत्ति ,माँ भी बँट गई
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माताजी को दुख मे पाकर
मेरा कलेजा मुह को आया ।
अनहोनी कुछ घटित न होवै
डाक्टर को मैं तुरत बुलाया ।।

     अस्सी वरष की उमर उसकी
     तीन बेटे एक बेटी जिसकी ।
     भरा पूरा परिवार है जिसका
    बँटा हुआ संसार है इसका ।।

सुध न कोई लेने वाला
मुख मे मिलता नहीं निवाला ।
छोटा बेटा साथ निभाता
हर सुख दुख वो साथ बिताता ।।

      जमीं संपत्ति बंट जाती पर
      ममता को क्या बांट सकेगा ।
     निज संतान के दुख मात्र से
     फटा कलेजा काट सकेगा  ।।

पोतों  और पोती पर अपनी
जान लुटाती वह दुखियारी ।
निज संतान भले भूल जाएं
भूल न सकती वह महतारी ।।

     जन्म देती पालन करती है
     रखती है उम्मीद बड़ी ।
     उन्हें बचाती हर संकट से
     विपदा जब जब आन पड़ी ।।

मिट चुका था माँग का सिन्दूर 
उजड़ा था उसका संसार ।
हिम्मत फिर भी हार सकी न
खडा़ किया अपना परिवार।।

    किसी तरह माता ने पढाया
    अपने निज संतानों को ।
    पूरा करती रही हमेशा
    उनके निज अरमानों को ।।

सबकी शादी कर दी इसने
घर में गूंजी किलकारी ।
भरे पूरे आँगन को देखा
खुश होती वह महतारी ।।

     अब तो घर में नहीं किसी को
     फिक्र है अपनी माता का ।
     बँटी संपत्ति माँ भी बँट गई
     मोल लगा हर नाता का ।।

माता पिता को दुख देकर 
क्या सुख से रह पाएगा ।
जैसा करेगा वैसा प्राणी
इस धरती पर पाएगा ।।

     माँ के चरणों में रहकर ही
     प्रेमशंकर सुख पाता है ।
     निशदिन सेवा कर माता का
     सुख से दिन बिताता है ।।


 विनाश का आगाज देख
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हो रही घुटन सी क्यों
न मिल रही ताजी हवा ।
दिख नही रही मुझे  
काम की कोई  दवा ।।

जो पुरानी व्याधियाँ
मिटती थी सेवा भाव से ।
बडो़ की हर सुझाव से
और अपनो के लगाव से ।।

चाहता न देखना अब
हर किसी को हर कोई ।
फूटता अँकुर धरा पर
बीज जो जैसी  बोई ।।

न वर्ण का न धर्म का
है दोष मानव कर्म का ।
कर रहे हैं भेद अब
इन्सान के हर चर्म का ।।

कर रहे  प्रयोग अब जो
बन रहा विषाक्त  है ।
कई तरह की व्याधियाँ 
बढ़ती हमारे पास है ।।

आज है हलचल दिलों में
मन हमारा शाँत है ।
उठती तीखी लहरों से
यह संसारअक्रांत है ।।

हाथ रख मस्तक पर अपने
बोल अब क्यों मौन है ।
आई जो  परिस्थितियाँ
उसके जिम्मेवार कौन है ।।

ना रहेगा बाँस तो क्या
बाँसुरी बजाएगा ।
बंद होगा कंठ तो तू
गीत कैसे गाएगा ।।

जीतना तू चाहता धा
हार रहा है आज देख
अब  प्रकृति के  द्वारा
विनाश का आगाज देख

कवी --प्रेमशंकर प्रेमी (रियासत पवई )औरंगाबाद

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