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चंद्रप्रकाश गुप्त "चंद्र" की गाँव तुलसी काव्य प्रतियोगिता में_saahitykunj


*साहित्य कुंज प्रतियोगिता*

शीर्षक -            *गाॅ॑व*


कभी लगता था शहर से न्यारा प्यारा मेरा गाॅ॑व

जहाॅ॑ बरगद,पीपल,नीम देते थे हमें मनोरम छाॅ॑व

हरे भरे खेतों मैदानों में चरती थीं बकरी, भैंसें,गायें

खेतों की टेढ़ी पगडंडी, चलते कभी न थे थकते पाॅ॑व

पर अब शहरों की नकल करते दिखते सारे गाॅ॑व

सभी अपनी आत्मा परिवेश भी बदल रहे हैं गाॅ॑व

अब पहले जैसी बात कहाॅ॑

नित नित कलुषित हो रहा माहौल वहाॅ॑

सघन वृक्षों की शाखाओं पर खग कुल की बोली

हर ओर धमाल मचाती बच्चों की टोली

मिलना, लड़ना फिर प्यार से रहना थी,गाॅ॑व की पहचान

होते थे खेत खलिहान और, छोटी छोटी दुकान

मिल जाता था थोड़े पैसों में, ढेर सारा सामान

मेला,दंगल, कबड्डी, पूजा पाठ,होती थी गाॅ॑व की शान

जहाॅ॑ विपदा प्रकृति आपदा में लोग कभी नहीं घबराते

मिल जुल कर सामना करते गीत सौहार्द के गाते

घोर हलाहल भी हॅ॑स हॅ॑स कर पी जाते

कष्टों के अंबार अपनी छाती पर सह जाते

कभी लगता था शहर से न्यारा प्यारा मेरा गाॅ॑व

जहाॅ॑ बरगद, पीपल, नीम देते थे मनोरम छाॅ॑व

पर अब नहीं रहे वो गाॅ॑व....अब नहीं रहे वो गाॅ॑व...


 चंद्रप्रकाश गुप्त "चंद्र"
        (ओज कवि)
   अहमदाबाद, गुजरात

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        सर्वाधिकार सुरक्षित
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