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तुलसी काव्य प्रतियोगिता में डॉ नूर फ़ात्मा की रचना पढिये_sahity




     मेरे दिली जज़्बात 
     

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तुलसी ख़ुसरो हो या कबीरा,
काली दास सूरदास हो मीरा।

एक हो सबने ये बतलाया,
आदमियत का पाठ पढ़ाया।

न कोई तेरा न कोई मेरा,
जा मिलेगा सब एक ही डेरा।

एक शज़र की सब हैं शाख़ें,
जैसे नदी की बहती धारा।

"नूर" ठाठ पड़ा रह जायेगा
  ख़ाक में सब जा मिलेगा 

      डाॅ. नूर फ़ात्मा
      मुगलसराय-चन्दौली
     24/06/2021
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1 Comments
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Unknown said…
U penned ur thoughts beautifully...👍