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पढ़िए अरविन्द अकेला की कविता "जब तक घरों में रहते थे अपने दादा-दादी"

कविता
जब तक घरों में रहते थे हमारे दादा-दादी

जब तक घरों में रहते थे हमारे दादा-दादी,
रहती थी वहाँ संयुक्त परिवार की आबादी,
रहते थे उन घरों में अपने चाचा चाची,
रहती थी गाँव-ज्वार में अपनी भी आजादी।
         जब तक घरों में रहते थे....।

गाँव-घर में मेरा परिवार था बड़ा खुशहाल,
सभी थे स्वस्थ-मस्त, नहीं था कोई तंगहाल,
गाँव-घर में थी अपनी घर की भी इज्जत 
सभी थे पढ़े-लिखे,नहीं था कोई आतंकवादी।
           जब तक घरों में रहते थे...।

मिट्टी की मजबूत दीवारों से बना था घर,
दिल-दिमाग-घर ठंडा रहता था चारों पहर,
सभी थे एक दूजे के हितैषी,अटूट सहयोगी,
नहीं था गाँव में कोई अनपढ, नक्सलवादी।
             जब तक घरों में रहते थे...।

मिट्टी का घर था,किसी का नहीं भय-डर था,
माहौल था खुशनुमा,नहीं किसी का कहर था,
गाँव-घर में अपनी भी इज्जत चहुँओर था,
नहीं था किसी का जुल्म,सभी थे आशावादी।
            जब तक घरों में रहते थे...।

जैसे हीं मरे हम सबके प्यारे दादा-दादी,
निकलने लगे घरों से सभी अलगाववादी,
घर के सारे झगड़े अब रोड पर आने लगे,
घर के अपने हीं लोग बनने लगे विवादी।
            जब तक घरों में रहते थे...।

अब भाई-भाई आपस में हीं लडने-मरने लगे,
गोतनी-गोतनी आपस में  लडने-झगड़ने लगे,
होने लगी अब बाप-दादा की इज्जत तार-तार,
करने लोग अपने घर की जोड़-तोड,बर्बादी ।
             जब तक घरों में रहते थे...।

घर की बहु-बेटियाँ पर्दे से बाहर आने लगे,
मर्दो से कदम से कदम वह मिलाने लगे,
भाई-भाई के घर लग गई नफरत की दीवार,
दूर खड़ी मुस्कुराने लगी गाँव की शहजादी।
             जब तक घरों में रहते थे...।

लोग जमीन जायदाद बेचकर शहर जाने लगे,
पुरखों के सपने बेचकर शहर में घर बनाने लगे,
जाने लगे घर के मामले अब कोर्ट-,कचहरी,
काटने लगे कोर्ट के चक्कर,बनने लगे फरियादी।
              जब तक घरों में रहते थे...।

पुरखों के संयुक्त परिवार का सपना टूट गया,
देखेगे थे जो सपने गाँव के वह सब फूट गया,
संयुक्त से आ गया एकल परिवार का जमाना,
खत्म हुआ चाचा-चाची का दौर व आजादी।
              जब तक घरों में रहते थे...।

आने वाला समय एक दिन ऐसा भी आयेगा,
बच्चा अपनी माँ से दुध के लिए तरस जायेगा,
नहीं मिलेगी उसे माँ की ममता व आँचल ,
देखकर रोयेगा कवि ,शायर या औरंगाबादी
              जब तक घरों में रहते थे...।
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       अरविन्द अकेला,पूर्वी नगर, पटना-27

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