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अकेला की कवितायें, साहित्यकुंज





कजरी गीत
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जबसे मोर कजरी गइल मायके हो रामा,
इस कजरा के मन लागे  ना हो हरि,
कोई तो बताये,अब का करुं उपाय रे रामा,
कैसे मोर कजरी मोर घर  आये हो हरि।

दिनवा तो कैसहँ बीती जाये हो रामा,
पर मोर ई रतिया बीते न हो हरि,
भर दिन भर उनका इंतजार करत हैं,
कभी कभी देखूं आपन घड़ी हो हरि।

कजरी बिन कजरा के मनो नहीं लागे,
दिन को तड़पे ,रात को जागे,
कजरी बिन कजरा के मन भागे हो रामा,
कब हो कजरी से कजरा के दर्शन हो हरि।
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           अरविन्द अकेला





जरा सोचें, ऐसा क्यों होता है 
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भारत माँ की गोद में पलकर,
हम सब जवान हुये हैं,
बाहरी दुश्मनों से लड़कर 
हम कभी कुर्बान हुये हैं,
उस समय हम एक बने थे,
पर आज क्यों झगड़ा होता है।


जरा सोचें,............।

भारत माँ की संतान हैं हम,
धर्म हमारा अलग-अलग है,
रामायण,कुरान व बाईबिल,
गुरुग्रंथन साहब अलग- अलग हैं,
सबों में निहित है प्रेम त्याग,
फिर हमारा तुम्हारा क्यों होता है।
जरा सोंचे , .............।

हम उस देश के वासी हैं,
जहाँ राम,कृष्ण अवतरित हुये थे  
धर्म और जाति से बड़ा मानव,

ऐसा गुरू नानक कहे थे ,
सबों ने सिखाया मानव धर्म,
फिर आपस का रगड़ा क्यों होता है।
जरा सोंचे ,...............।

रहा कभी स्वर्णिम इतिहास हमारा ,
जिसने दुनियाँ को ज्ञान सिखाया था,
हम भूल गये एक दूजे को,
आपस का मारा-मारी क्यों होता है।
जरा सोंचे , .............।
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           अरविन्द अकेला

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