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लघु कथाओं की दुनिया, साहित्यकुंज की प्रस्तुतिकथाकार-अरविंद अकेला


लघुकथा 

 मेरे घर से निकल जाओ
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    मेरे घर से बाहर निकल जाओ, नहीं तो तुम्हें धक्के मार-मार कर अपने इस घर से बाहर निकाल दूंगा। मेरे घर को अपने बाप का घर समझ रखा है जब तक चाहेंगे तब तक रहेंगे। क्या मैनें तुम्हें जिन्दगी भर पालने पोषने का ठेका ले रखा है।
   इतना कहकर बलबंत ने दशहरे के रामनवमी के दिन खाना खा रहे अपने भतीजे रामू को धक्के मार कर अपने घर से निकाल दिया।
   रामू उस घर से अपने किताब कौपी और कपड़े लेकर रोते हुए निकट के लौज में चला गया। रामू को रोते बिलखते देखकर पास के करीम चाचा ने रामू से पूछा बेटा रामू तुम क्यों रो रहे हो।
     इतना सुनते हीं रामू और जोर जोर से फफक फफक कर रोने लगा। रोते हुए रामू बोला आज मेरे चाचा जी ने हमें अपने घर से धक्के मार कर निकाल दिया है।
     अरे तो इसमें इतना रोने की जरुरत क्या है मैं  जो हूँ ना तेरे साथ। चलो मेरे साथ मेरे घर में,जब तक मन चाहे तब तक रहना। 
     तभी पड़ोस के सीताराम चाचा ने कहा इसके चाचा बलवंत को अपने सगे भतीजे रामू के साथ ऐसा दुर्व्यवहार  कभी नहीं करना चाहिए था। रामू बेचारा अपने बाप का तुअर है। रामू जब अपने माँ के गर्भ में था तभी इसके पिता दयावंत चल बसे थे।
     कलीम चाचा ने एक लम्बी श्वास छोड़ते हुये कहा बेटा तू चिन्ता न कर। जिसका कोई नहीं उसका खुदा होता है। हे परवरदिगार तू इस बच्चे पर रहम कर और इसकी रक्षा कर।
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           अरविन्द अकेला

    लापरवाही
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लॉकडाउन समाप्ति के बाद 40 वर्षीय जमील अहमद खुलेआम बिना मास्क पहने व सोशल डिस्टेन्ससिग का पालन किये बिना विगत एक माह से इधर उधर घुम रहा था कि जाने अनजाने किसी कोरोना पॉजिटिव के सम्पर्क में आने के कारण उसमें सर्दी, खाँसीं बुखार व श्वांस लेने में तकलीफ के लक्षण आने लगे थे।देखते ही देखते यह लक्षण और बढ़ते गया  था।
    जाँच व इलाज कराने के बाद पत्ता चला की जमिल को कोरोना पॉजिटिव है। ईलाज कराने के दौरान जमील की मृत्यु हो गयी 
   जमील की मृत्यु पर उसकी पत्नी विलख विलख कर रोने लगी और रोते हुये बोली की हम इन्हें बार बार कहते थे कि बिना मास्क पहने इधर उधर भीड़ भाड़ वाले इलाके में मत जाईये, परंतु ये नहीं माने।
      उसीका का नतीजा और लापरवाही का परिणाम है कि अब आप हमलोगों के बीच नहीं हैं। यदि आप हमलोगों कि बात मान लेते तो ऐसा नहीं होता।
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       अरविन्द अकेला
  

       मुनिया
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      अरे बेटा रामू, जाकर के देखो तो मुनिया के दरवाजे पर इतनी भीड़ क्यों लगी है कौन आया है, कहाँ से आया है और किसलिए आया है। जा करके देख जरा और पता लगाकर हमें बता। इतना कहकर कमला चाची अपने घर नहाने के लिए चली गयी।
     रामू जाकर देखता है कि मुनिया के बाप अजय की शादी के लिए   पास ही के गाँव से कुछ लोग आये हैं और खाट पर बैठकर अजय चाचा का इंतजार कर रहे हैं।
     तभी शादी के लिए आये लोगों ने कहा कि कोई जाकर देखो कि अजय बाबू कहाँ गये हैं, उनको बुलाकर लाओ। गाँव के कुछ लड़के अजय को बुलाने के लिए पास हीं के बगीचे में जाकर देखते हैं कि वहाँ अजय चाचा ग्रमीणों के साथ बैठकर तास खेल रहे हैं। बच्चे उन्हें बताते हैं कि आपकी शादी के लिए पास ही के गाँव से कुछ लोग आये हैं। चलिये वे लोग आपको खोज रहे हैं।
        अच्छा तो तुमलोग मेरे घर जाओ और उन्हें यह बताओ कि हम थोड़ी ही देर में आ रहे हैं।
       और इधर अजय यह सोचने लगा कि मुनिया की माँ रधिया को मरे हुये अभी एक साल भी नहीं बीते हैं कि मैं तुरंत दुसरी शादी कर लूँ और अभी मेरी बेटी मुनिया मात्र दो साल की हीं है । क्या मुनिया के रहते हुए दुसरी शादी करना ठीक रहेगा ? ।क्या मुनिया की नयी माँ मुनिया को अपनी बेटी की तरह मानेगी,पलेगी,पोषेगी और उसे एक माँ का प्यार देगी और उसकी नयी माँ उसे अपनी बेटी की तरह नहीं मानकर उसे सतायेगी,मारेगी,पिटेगी  तो मुनिया का जीवन नर्क हो जायेगा, तबाह हो जायेगा। इसकी भी क्या गारंटी रहेगी कि  दुसरी पत्नी से बेटा ही होगा और यदि दुसरी पत्नी से भी पुन: बेटी हो गयी  तो मेरा जीवन तबाह हो जायेगा। बड़े बुजुर्ग कहा करते हैं कि शादी एक संस्कार है जिसे अपने भविष्य के उत्तराधिकारी व कुल की बृद्धि के लिए किया जाता है सो मैनें भी किया और मुनिया के रुप में हमें उत्तराधिकारी  व कुल की बृद्धि करने वाली मिली तो क्या हमें एक संतान के रहते दुसरी शादी करना क्या जायज रहेगा। शायद नहीं । दुसरी शादी करना तो काम वासना की पूर्ति करने के समान ही होगा ।राक्षस और  राक्षसी प्रवृति के लोग ही एक संतान के रहते दुसरी शादी करते हैं।
     अब मैं मुनिया को ही खुब पढ़ाऊंगा, लिखाऊंगा और उसे एक अच्छा इन्सान व अफसर बनाऊंगा लेकिन उसके लिए कोई दुसरी माँ नहीं लाऊंगा चाहे कोई भी लड़की कितनी भी सुन्दर क्यों न  हो।
     मैं अभी जाकर लड़की वालों को अपनी शादी करने से इन्कार कर देता हूँ।
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           अरविन्द अकेला

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